'स्वाधीनता के गान' में गूँजा वतन परस्ती का पैगाम 

 ·      वंदेमातरम् के सामूहिक जयकारों और लहराते तिरंगों के बीच गहराया देशभक्ति का रोमांच 

 ·      आरएनटीयू, एसजीएसयू और विश्वरंग की अनूठी सांस्कृतिक सौगात 

भोपाल। बादल, बयार और बौछारों से गमकती गुरूवार की शाम राजधानी के आसमान पर देशभक्ति का सतरंगी इन्द्रधनुष खिला। शब्द, स्वर, लय-गतियों और देह-मुद्राओं का जादुई सम्मोहन जगाते नौनिहाल तथा युवा कलाकारों ने रंगमंच पर आज़ादी के महासमर की गाथा रच दी। ये ‘‘स्वाधीनता के गान‘‘ की रंगोमहक से भरी एक सुंदर सौगात थी। रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय और विश्वरंग फाउण्डेशन के संयोजन में तैयार हुई अनूठी इस प्रस्तुति को देखने शहर के कलाप्रेमियों का हुजूम रवीन्द्र भवन में उमड़ आया। हर गीत पर तालियाँ बजी, नृत्य की थिरकन जागी और भारत माता के जयकारों की गुंजार सभागार में फैल गयी। समापन पर जैसे ‘वंदेमातरम्’ की प्रस्तुति शुरू हुई दर्शकों के हाथों में भारत का तिरंगा लहरा उठा।

हिन्दी पत्रकारिता की दो सदी के निमित्त शब्द की सांस्कृतिक यात्रा और राष्ट्र के प्रति उसकी रचनात्मक भूमिका पर केन्द्रित समारोहों की श्रृंखला में कविता, नृत्य और संगीत का यह रूपक अभिव्यक्ति की अद्वितीय मिसाल बन गया। वरिष्ठ कवि-कथाकार संतोष चौबे की मुख्य परिकल्पना, प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना क्षमा मालवीय का नृत्य संयोजन, संतोष कौशिक और राजू राव का संगीत तथा जाने-माने कला समीक्षक विनय उपाध्याय की धीर-गंभीर आवाज़ में बढ़त लेती वतन परस्ती की कहानी रोमांचक अहसास में बदल गयी। पुरू कथक नृत्य अकादेमी की पिचहत्तर से अधिक नृत्यांगनाओं ने अपनी मनोहारी भाव-मुद्राओं से दर्शकों का मन जीत लिया। रंगकर्मी अनूप जोशी का प्रकाशन आकल्पन, उमेश तरकसवार के संगीत संयोजन तथा आईसेक्ट स्टुडियो के तकनीकी समन्वयक ने पूरी प्रस्तुति को बेहतर प्रदर्शन में ढाला।

जब शब्द देशभक्ति बन जाएँ, जब कविता आंदोलन बन जाए और जब नृत्य बलिदान की गाथा कहे- तब इतिहास सिर्फ़ पढ़ा नहीं जाता, जिया जाता है। रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय ने ऐसा ही दृश्य रच दिया। भारतेन्दु से लेकर निराला और माखनलाल चतुर्वेदी से लेकर सुभद्रा कुमारी चौहान तक बाहर कवियों की पंक्तियाँ यहाँ केवल पढ़ी और गायी नहीं गई नृत्य और संगीत की भाषा में भी उनके गहरे आशय उभरकर सामने आए। इस सभा का संदेश था कि नई पीढ़ी को समझाना ज़रूरी है कि स्वाधीनता हमें विरासत में नहीं मिली, उसे शब्द, गीतों और बलिदानों से कमाया गया है। आज के बच्चे जब ‘‘वीरों का कैसा हो वसंत‘‘ पर थिरकते हैं, तो लगता है वह चेतना अब भी जीवित है।

कुलाधिपति संतोष चौबे ने अपने उद्‌बोधन में कहा कि यही वो समय है जब हम उन कविताओं को भी याद करें जिनकी ओजस्वी आवाजें गुलामी के अंधेरों में भारत के जन मन के लिए आत्म जागृति की अग्निशिखा बनीं। कलम के सिपाही आगे आए। स्वाधीनता के गान का यह प्रसंग शब्द की सत्ता के प्रति युवा पीढ़ी का विश्वास जगाना और उसके साधकों के प्रति  सामूहिक कृतज्ञता का अवसर है।

इस अवसर पर आईसेक्ट पब्लिकेशन द्वारा आज़ादी के अमृत महोत्सव के उपलक्ष्य में प्रकाशित पुस्तक ‘स्वाधीनता के गान’ का लोकार्पण भी हुआ। हिन्दी के 34 कवियों की पचास से भी अधिक देशभक्ति की कविताओं का यह संग्रह साहित्यकार श्रीराम परिहार तथा रामवल्लभ आचार्य ने तैयार किया है। परामर्श संतोष चौबे और समन्वय विनय उपाध्याय का रहा।

'स्वाधीनता के गान' समारोह दरअसल रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति की एक विशेष परियोजना की रचनात्मक परिणति है। आज़ादी के अमृत महोत्सव के निमित्त विचार आया कि आधुनिक हिंदी की कविता यात्रा को देश भक्ति के संदर्भ में गहराई से देखा-परखा और प्रस्तुत किया जाए। इस अभियान में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के समय का सिरा थामते हुए वीरेन्द्र मिश्र तक हिंदी की ध्वजा थामने वाले कवियों की रचनाओं का संग्रह तैयार हुआ।

ये रहे स्वाधीनता के गान... 

·      भारत दुर्दशा- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

·      उरूजे कामयाबी पर- जगदम्बा प्रसाद मिश्र

·      मस्तक ऊँचा रहे मही का- मैथिलीशरण गुप्त

·      हिमाद्रि तुंग श्रृंग- जयशंकर प्रसाद

·      ज्योति भूमि जय भारत- सुमित्रानंदन पंत

·      जागो फिर एक बार- सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

·      वीरों का कैसा हो वसंत- सुभद्राकुमारी चौहान

·      बढ़े चलो, बढ़े चलो- सोहनलाल द्विवेदी

·      जाग तुझको दूर जाना है- महादेवी वर्मा

·      मेरे नगपति, मेरे विशाल- रामधारी सिंह दिनकर

·      चाह नहीं मैं सुरबाला- माखनलाल चतुर्वेदी

·      वंदेमातरम्- बंकिमचन्द्र चटर्जी